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जल संकट से जूझने लगा पहाड़

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नरेन्द्र सिंह बिष्ट


नैनीताल, उत्तराखण्ड

भारत एक कृषि प्रधान देश है यदि जल संकट विनाशकारी रूप को धारण करता है तो देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि पर इसका असर पडेगा फसलों की पैदावार कम होने के साथ खाध्य पदार्थो की कीमतें बढ़ जायेगी वही आम आदमी को इसके दुष्प्रभाव को झेलना पडेगा. सरकार द्वारा इस समस्या को कम करने के उददेश्य से अगस्त, 2019 से राज्यांे के साथ साझेदारी में जल जीवन मिशन-हर घर जल को लागू किया जिससे 2024 तक हर ग्रामीण घरों में नल का जल पहुॅच सके जिसके अन्तर्गत जुलाई, 2023 तक राज्यों/संधों के 176363 ग्रामों में से 65826 ग्रामों में हर घर जल के रूप में प्रमाणित किया गया है जो एक सकारात्मक प्रयास के रूप में है पर विचारनिय विषय बन रहा है इन नलों में जल कहां से आयेगा क्योंकि जल देश के लिए एक ज्वलन्त समस्या है.
पहाड़ जो अधिकांश नदियों का उदगम स्थल है उन्ही पहाड़ों में जल की समस्या विकराल होती जा रही है जल स्रोतों में कमी, नदियाॅ सूखने लगी है और जहां जल कम मात्रा में है उसे भी मशीनों के द्वारा निकाल कर खत्म किया जा रहा है वास्तविकता यही है जो जल है वह आबादी की पूर्ति कर पाने में सक्षम नहीं है. पहाड़ हो या मैदान लोगों को पीने के लिए जल तक उपलब्ध नही हो पा रहा है तो ऐसे में हर घर में नल में जल का होना अत्यन्त ही सोचनीय विषय है. बढ़ती आबादी के चलते मकानों में इजाफा हो रहा है और वह पाइप लाइन जो पूर्व में सीमित घरों की जल आपूर्ति करने में सक्षम थे उनमें कई कनेक्शन हो जाने से सभी को जल नहीं मिल पा रहा या कम मात्रा में मिल रहा है.
सेलालेख, धारी, नैनीताल से पानी के दर्द को बया करती जानकी देवी बताती है कि ग्राम में वर्तमान समय में भी पाइप लाइनों के बिछने का कार्य प्रगति पर है वर्तमान समय में जल एक दिन छोड़कर अधिकतम 15 मिनट ही आता है जिससे ग्राम के 250 परिवारों की जल पूर्ति होती है तो सोचिए की एक परिवार को कितना जल मिल पाता होगा नजदीकी जल स्रोत वाहय लोगों की आवाजाही के चलते सूखने के कगार पर है साथ ही इनके नजदीक गन्दगी का गुब्बार फैलने लगा है. पहाड़ों में पर्यटकों की आवाजाही दिन प्रतिदिन बढ़ रही है हर ग्रामों में होम स्टे बनाये जा रहे है होटलों/आवासों का निर्माण हो रहा है जिसकी जल आपूर्ति नजदीकी स्रोतों या नदियों से होनी है तो भविष्य में पहाड़ जल संकट से जूझता दिखायी देगा.
पहाडो़ में जल सूखने के कगार पर है जिसके कई कारण है जिसमें बढ़ता तापमान, औघोगिकरण वनाग्नि, पलायन प्रमुख है वही मनुष्यों द्वारा जल के बढ़ते उपयोग से न केवल औघोगिक और कृषि विकास के लिए उपलब्ध जल की मात्रा कम हो रही है बल्कि जलीय पारिस्थितिकी तंत्र और उन पर निर्भर प्रजातियों पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ रहा है. पृथ्वी पर दूसरी सबसे बड़ी जनसंख्या  1.3 बिलियन है जो 2050 तक 1.7 बिलियन तक बढ़ने की उम्मीद है जहां एक ओर जनसंख्या बढ़ रही है वही दूसरी ओर जल के स्रोत दिन प्रतिदिन सूख रहे है वही भारत अपनी अधिकांश जनसंख्या को सुरक्षित, स्वच्छ जल उपलब्ध कराने में स्वयं को असमर्थ पा रहा है. ग्राम धानाचूली, धारी, नैनीताल से सरपंच हंसा लोधियाल का कहना है जल संकट के कारणों पर बात की जाए जो तेजी से बढ़ते शहरीकरण और औधोगिकरण के चलते जल प्रदूषण व संकट में वृद्धि देखने को मिल रही है वही अकुशल कृषि पद्धति और अत्यधिक भूजल दोहन के चलते जल सा्रेतों को नुकसान हो रहा है जलवायु परिवर्तन ने जल की परिस्थिति को और खराब कर दिया है ससमय/अनियमित वर्षा पैटर्न होने से जल स्तर में गिरावट देखने को मिल रही है. पहाड़ों में चीड़ (पाइन) इस प्रकार फैल चुका है जिसने लगभग 65 प्रतिशत वन क्षेत्र को कवर कर लिया है चीड़ के जंगलों में तापमान अत्यधिक गर्म होता है साथ ही यह अन्य प्रजातियों को भी नहीं पनपे देता है इस पर विचार किये जाने की आवश्यकता है.
वैल्यू नेटवर्क वेंचर्स (वी.एन.वी), बंगलौर, भारत व आरोही संस्था नैनीताल द्वारा उत्तराखण्ड राज्य के 05 जपनदों (नैनीताल, अल्मोड़ा, चम्पावत, बागेश्वर व पिथौरागढ़) की 304 वन पंचायतों में 40 लाख पौधों (15प्रजातियाॅं)े का रोपण कार्य किया गया जिससे जल-संरक्षण, चारा व पर्यावरण संरक्षण में अमूल्य सहयोग होगा. जंगलों में या खाली स्थानों पर चाल, खाल-खन्तियों व छोटे पोखरों का निर्माण करके भूमिगत जल संग्रहण किया जाता है जिससे हमारे नौले, गधेरे व नादियों में जल स्तर में वृद्धि होती है तो इन्हें भी बनाये जाने की जरूरत है. वर्तमान समय में जल के महत्व को समझने की आवश्यकता है इसके गलत उपयोग पर रोक लगाये जाने की आवश्यकता है यदि जल के दुषप्रयोग को रोका जा सके जो भविष्य में जल संकट की समस्या उत्पन्न नहीं होगी स्वयं को जागरूक किये जाना है यदि हम जल को व्यर्थ होने से रोक पायेगे तो निश्चित् रूप से हमारी आगामी पीढ़ी को जल के संकट से नहीं जूझना पड़ेगा.


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