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राज्य स्थापना दिवस पर पहाड़प्रेमी कवि योगेश बहुगुणा की नई भावुक कविता आ गई है, उत्तराखंड के 22 साल के इतिहास को अपनी कविता के माध्यम बताया !पढ़ें 👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻👇🏻

हल्द्वानी

आज उत्तराखंड अपने 22 वर्ष पूर्ण कर चुका है। इन बाइस वर्षो में उत्तराखंड जिस दौर से गुजरा है ये प्रदेश की जनता के सामने है। निरंतर बढ़ते पलायन, बेरोजगारी महंगाई ने यहाँ पर राज करने वाली सभी सरकारों की कलई खोल के रखी है। युवा कवि योगेश बहुगुणा “योगी” ने उत्तराखंड की वर्तमान स्थिति और 22 साल के इतिहास को अपनी कविता के माध्यम से प्रदेश के जनमानस तथा नेताओं के सामने रखा है। आप भी पढ़ें !

कहाँ खो गया उत्तराखंड ये सोच रहा हूँ।
मैं उत्तराखंड में उत्तराखंड को खोज रहा हूँ।।
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जिसके लिए आंदोलनकारी, कितनी बार ही जेल गए।
अलग राज्य की माँग हेतु, जानों पर अपनी खेल गए।
माता बहनों का अपमान, ना जाने कितनी बार हुआ।
कभी मसूरी कभी खटीमा, खुलेआम नरसंहार हुआ।
इतिहास के उन पन्नों से धूल को पोछ रहा हूँ।
मैं उत्तराखंड में उत्तराखंड को खोज रहा हूँ।
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अच्छी शिक्षा अच्छा स्वास्थ्य, और सबके लिए रोजगार होगा।
जल जंगल जमीनों पर, हम सबका ही अधिकार होगा।
कोई बाहरी आकर हमको, बिल्कुल भी ना टोक सकेगा।
हमें हमारे कर्तव्यों से, कोई भी ना फिर रोक सकेगा।
मैं दिल में रखी उन उम्मीदों को खरोच रहा हूँ।
मैं उत्तराखंड में उत्तराखंड को खोज रहा हूँ।


देवभूमि का कोई भी क्यों हिस्सा ना इससे छूटा है,
राजनीति ने उत्तराखंड का जर्रा जर्रा लूटा है,
जो उत्तराखंड के लिए लड़े उनकी कुर्बानी याद नहीं,
क्यों रामपुर खटीमा व मसूरी के बलिदानी याद नहीं।
समझ ना पाया अब तक क्यों बेहोश रहा हूँ।
मैं उत्तराखंड में उत्तराखंड को खोज रहा हूँ।


क्यों यहाँ के बच्चों के सपने बेकार ही रह धरे गए,
नौकरियों में सरकारी-निजी यहाँ बाहरी भरे गए,
क्यों पढ़ा लिखा उत्तराखंडी, घर छोड़ने को मजबूर हुआ
उदर की भूख मिटाने को, मां माटी से ही दूर हुआ।

अपनी अनदेखी देख भी क्यों खामोश रहा हूँ।
मैं उत्तराखंड में उत्तराखंड को खोज रहा हूँ।
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क्यों पहाड़ों के नेता ना जाने गुलाम हुए हैं शहरों के,
हम चिल्ला चिल्ला थक गए पर जूं ना रेंगी इन बहरों के,
यहाँ के जल जंगल जमीन क्यों बिक गए हाथ दलालों के,
और हमारे हिस्से कुछ ना आया सिवाय मलालों के।
क्यों भूल पहाड़ियत निज हित में मदहोश रहा हूँ।
मैं उत्तराखंड में उत्तराखंड को खोज रहा हूँ।
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रोज यहाँ से जाने कितनी बहनें गायब होती हैं,
और हमारी सरकारें क्यों चैन की नींदें सोती हैं।
कोई दहेज से पीड़ित है कोई मौत के घाट उतारी गई।
कोई बहन अंकिता की तरह सत्ता की हनक में मारी गई।
इस बदहाली का सत्ता पे मढ़ दोष रहा हूँ।
मैं उत्तराखंड में उत्तराखंड को खोज रहा हूँ।
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ये सब देख के मन में तुम्हारे कोई सवाल नहीं आता,
बढ़ते अत्याचारों से क्या तनिक भी उबाल नहीं आता।
खुला सांड सा छोड़ दिया क्यों चोर उचक्के लफंगों को।
क्यों अपने थोड़े हित के खातिर कुर्सी सौपी दबंगों को।
पाकर सत्ता जिनको लग में बोझ रहा हूँ।
मैं उत्तराखंड में उत्तराखंड को खोज रहा हूँ।
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दिल्ली वाले दलों के दलदल में क्यों हम धसते गए,
अपने पराए हुए दिलों में गैर क्यों बसते गए,
कहो पहाड़ के लोगों का पलायन क्यों जोरों पर है,
मूल निवासी पे ध्यान नहीं सरकार का क्यों औरों पर है।
हो गई मुझसे भूल मैं खुद को कोस रहा हूँ
मैं उत्तराखंड में उत्तराखंड को खोज रहा हूँ।
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आकर चोर उचक्कों ने यहाँ खूब माहौल बिगाड़ा है,
और खेल हमारी संस्कृति से लाज का पर्दा फाड़ा है।
हम दिल्ली वाले दलों की क्यों कुर्सी और दरी बिछाते रहे।
जो पहाड़ी सोच को दबा रहे क्यों उनके झंडे उठाते रहे।
मैं हर उत्तराखंडी अब ये पूछ रहा हूँ।
मैं उत्तराखंड में उत्तराखंड को खोज रहा हूँ।

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