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परामर्श दात्री समिति कुमाऊं (उत्तराखंड) जिलाध्यक्ष अल्मोड़ा गणेश चंद्र जोशी के द्वारा वन पंचायतों की समस्याओं हेतु ज्ञापन सौंपा!

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हल्द्वानी,नैनीताल!!

परामर्श दात्री समिति कुमाऊं (उत्तराखंड) जिलाध्यक्ष अल्मोड़ा गणेश चंद्र जोशी के द्वारा आज दिनांक उत्तराखंड के मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी को ज्ञापन दिया दिए गए ज्ञापन के अनुसार

सेवा में,

      माननीय मुख्यमंत्री (श्री पुष्कर सिंह धामी).
उत्तराखंड सरकार, सचिवालय देहरादून
विषय: उत्तराखंड में वन पंचायतों की संवैधानिक स्वायत्तता, अधिकारों और कार्यक्षमता की बहाली एवं संरक्षित वनों के संरक्षण हेतु विधिक व प्रशासनिक हस्तक्षेप की आवश्यकता।

महोदय,

        उत्तराखंड राज्य की वन पंचायते, भारतीय संविधान और प्रासंगिक विधानों के तहत स्थापित राज्य के वनों के सतत संरक्षण एवं स्थानीय समुदायों के अधिकारों को संरक्षित करने की दृष्टि से अनमोल सस्था है। ये पंचायतें न केवल पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने का कार्य करती है, बल्कि ग्रामीण समुदायों की आजीविका परपरागत अधिकारी और स्थानीय प्रशासन में सक्रिय भागीदारी का प्रतीक भी हैं।
वर्तमान में वन पंचायते प्रशासनिक उपेक्षा, बाह्य हस्तक्षेप और नीतिगत विसंगतियों के कारण कई गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। इन हातातों में, उनकी संवैधानिक स्वायत्तता और प्रभावशीलता सुनिश्चित करने के लिए आपके नेतृत्व में एक ठोस एवं
दूरगामी दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है।

१. वन पंचायतों को ग्राम प्रधानों के अधीन लाने संबंधी किसी भी प्रस्ताव को अविलंब निरस्त किया जाए। ऐसा कोई भी कदम उनकी स्वायत्तता का उत्तधन करेगा. जो भारतीय संविधान की मूल भावना और लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण के सिद्धांतों के विपरीत होगा।

2. वन पंचायतों को प्रभावी, वित्तीय और कानूनी अधिकार प्रदान करने हेतु प्रचलित नियमावली का पुनर्मूल्यांकन और आवश्यक संशोधन किया जाए। यह सुनिश्चित किया जाए कि पंचायतें अपने संवैधानिक कर्तव्यों को स्वतंत्र और प्रभावी तरीके से निभा सकें।

3. वन पंचायतो की समस्याओं और उनकी नीतिगत आवश्यकताओं पर विचार करने के लिए एक उच्च स्तरीय परामर्शदात्री समिति गठित की जाए। इस समिति मे सरपंचों, पर्यावरण विशेषज्ञों और सरकारी अधिकारियों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए।

4. पचायत प्रतिनिधियों को कार्यक्षमता बढ़ाने हेतु पर्याप्त वित्तीय संसाधन, तकनीकी प्रशिक्षण और सम्मानजनक मानदेय प्रदान किया जाए।

5. वन पंचायतो के अधिकार क्षेत्र में ठेकेदारी और एनजीओ के अनावश्यक हस्तक्षेप को समाप्त किया जाए। इससे पंचायतों को उनकी भूमिकाओं को प्रभावी ढंग से निभाने में सहायता मिलेगी।
इसके अतिरिक्त अन्य मांगों भी रखी गई!


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